Last modified on 16 दिसम्बर 2020, at 23:28

एक बरगद उग आया है भीतर / ज्योति रीता

सशुल्क योगदानकर्ता ५ (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 23:28, 16 दिसम्बर 2020 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=ज्योति रीता |अनुवादक= |संग्रह= }} {{KKCat...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)

इन दिनों
एक बरगद उग आया है भीतर
गहरी जड़े लिए
तन कर खड़ा
फैला रहा छाँव
तले जिसके सुकून है बहुत
मरुस्थल में किसी हरे-भरे द्वीप सा
भटके पंछी सी मैं
उसके पीठ पर सुस्ता रही हूँ
कुछ देर से

हाँलाकि
नक्शे पर वह बरगद कहीं नहीं है
पर नक़्शे पर
मरुस्थल हमेशा से रहा॥