भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

धरती सोई थी / श्याम सखा ’श्याम’

Kavita Kosh से
अनिल जनविजय (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 18:44, 10 अक्टूबर 2008 का अवतरण

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

धरती सोई थी
अम्बर गरजा

       सुन कोलाहल
       सहमी गलियां
       शाखों में जा
       दुबकी कलियां

बिजली ने उसको
डांटा बरजा

        राजा गूंगा
        बहरी रानी
        कौन सुने
        पीर-कहानी

सहमी सी गुम-सुम
बैठी परजा[प्रजा]

        घीसू पागल
        सेठ-सयाना
        दोनो का है
        बैर पुराना

कौन भरेगा
सारा कर्ज़ा