Last modified on 28 अगस्त 2022, at 12:49

अन्धेरे दिनों में प्यार / शशिप्रकाश

अनिल जनविजय (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 12:49, 28 अगस्त 2022 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=शशिप्रकाश |अनुवादक= |संग्रह= }} {{KKCatKavi...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)

नागफनी के जंगलों के बीच से
बहती रहती है
एक दुबली-पतली नदी
मेरे सपनों में I

मौन-अचल पड़कर
इसकी जलधार में,
बस, बहते ही जाना चाहता हूँ
इसकी स्निग्ध-धवल धार में I

क्यों इतनी कड़वी है ज़िन्दगी
हमारे आसपास,
इतनी बेरंग और उदास क्यों है ?
जैसेकि लोगों की एक-एक साँस पर
दुस्वप्नों का कोई बोझ लदा हो I

बीच-बीच में
दुनिया भर की थकान ढोते
खेत से लौटे बैल की तरह
पहुँच जाना चाहता हूँ
तृषित, इस जलधार तक, जो मेरा प्यार है,
बहता रहता है शान्त
नागफनी के जंगलों से होकर
चुपचाप !