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हिन्दी सीझ रही है / मंजुला बिष्ट

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पुरानी हिन्दी बनाम नई हिन्दी मौलिकता
को लेकर उठे वैचारिक द्वंद्व के बीच
कहीं भाषा की आत्मा लय-ताल न खो दे

क्या इतना काफी नहीं है
भाषा के आलोचकों और पुरोधाओं के लिए ;
कि हिन्दी खूब बोली जा रही है
लिखी जा रही है..समझी जा रही है

पुराने बासमती चावल सी
हिन्दी सीझ रही है मनुज की आत्मा में
भाषा का नमक चढ़ने दो
उसके मनमाफ़िक पाठकों तक
उस पाठक तक ;
जो,सिर्फ हिन्दी को जानता-पहचानता है
उसकी आयु को नहीं

यह हिन्दी उसकी पुरखों की आदिम वाणी है
इसे बार-बार फूटने दो,बहने दो,लौटने दो...
रह जाये इतनी पहचान और ठसक
अपनी हिन्दी की ;
कि इसकी सभा-चौपालों में
आने वाले के कांधे में
अगर गँधाता नमकीन अंगोछा हो
या झूलती हो कोई सुगन्धित विदेशी टाई
तो भी मंच पर कोई पराई अकबक़ाहट न हो

बस,
उसके मुँह से जब नेह बरसे
गझिन आत्मीयता से
या फूटे कोई आक्रोश भी ;
उस बोली की त्वरा और तेवर
अपनी हिन्दी का हो

भले ही वह किसी भी जनपद की हो
टूटी-फूटी या मिश्रित ही सही
सोंधी न सही खाँटी ही भली!
अनबुझी रह जाए तो कोई बात नहीं
अनसुनी रह जाए तो मलाल नहीं

देखना!
हिन्दी की आत्मा
अपनी खूँटी से रँभाती गईया की तरह
अपना नाम हर बोली में पहचान ही लेगी।