कभी देखी हैं सूने स्टेशनों पर
पटरियाँ
जो नहीं ले जातीं
किसी को कहीं
पड़ी रहती हैं केवल वहीं
उजड़ा हुआ डिब्बा कभी कोई
आ खड़ा होता है वहाँ
कुछ वक़्त
कोई हमेशा ही खड़ा रहता है--
आसरा किसी बेघर का
ऎसे ख़राबों की हमनशीं
इन पटरियों-सा
बिछा हूँ मैं यहीं-
कहीं पहुँचाने का वायदा नहीं कोई
नहीं, कोई हमदर्दी नहीं
बसेगा तुम से
मेरा भी उजाड़ यह कहीं ।