भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

सत्य के तन के कई टुकड़े हुए / जहीर कुरैशी

Kavita Kosh से
Pratishtha (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 08:45, 7 फ़रवरी 2009 का अवतरण

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज


सत्य के तन के कई टुकड़े हुए
एक दर्पन के कई टुकड़े हुए

स्वार्थ छोटे जब बड़े होने लगे
मूल आँगन के कई टुकड़े हुए

रूप यदि भूलों का का अल्बम बन गया
रूप के मन के कई टुकड़े हुए

हो गए जिस रोज़ पति-पत्नी अलग
मूक बचपन के कई टुकड़े हुए

धर्म पर इतने मतान्तर हो गए
ईश -वन्दन के कई टुकड़े हुए