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दोपहर : दो चित्र / विष्णुचन्द्र शर्मा
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पढ़ाई
पेड़ों ने
कुछ नहीं लिखा है
जिसे मैं पढ़ सकूं!
चिडि़या ने
धूप से कहा है
कुछ
जिसे सिर्फ
सरसों ने पढ़ा है।
आकाश के आगे
रख दिया है
मैंने
आज की डायरी का
पन्ना
आकाश ने
उसमें सिर्फ
बिजली के
खो जाने का
गीत लिख दिया है।
पसरा हूं मैं
कबीरदास
चटक रंग के दुपहिरया के
फूलों से मिल रहे हैं।
दुपहिरया के
एक-एक फूल
सुना रहे हैं अपनी-अपनी
कबीरदास को
दोनों के बीच
मैं पसरा हूं खुले रंगमंच पर
रंगमंच पर
कवि और पाठक बैठक
साखी के शब्द-शब्द का
अर्थ खोल रहे हैं।