तुम मेरे बाप हो / प्रज्ञा दया पवार
तुम मेरे बाप हो
और मैं तुम्हारी बेटी
अपना नाता क्या सिर्फ़ इतना ही है?
इन जैविक बिन्दुओं के परे मैं तुम्हें जानती हूँ
और तुम मुझे जानते हो
ककहरे और वर्णमाला की रह पर
तुमने मुझे क्या दिया?
और मैंने तुमसे क्या लिया?
तुमने कभी मेरा दिल उलझाया नहीं
गुड़ियों के खेल में
चूल्हे बर्तनों की कजरती छाया
मेरी कोमल किरणों पर कभी तुमने पड़ने नहीं दीं
में सहज ही मुक्त हुई
बुन्दकों वाली सफ़ेद रंगोली से और
बनाई के खड़े आड़े चौखानों से
तुमने दिखाया मुझे
गाँव को टुकड़ों में बाँटनेवाला
भूत का कसकता जलाता पट्टा
और वर्तमान में उमड़ आया
चैत्य भूमि का शांत महासागर
मोमबत्तियों की मंद रोशनी में
चमकती आँखों की पुतलियाँ
और सपनों की गठरी लेकर लौटते
अपने ही विराट संकरे पैर
तुम्हारे अन्दर के दुःख से तड़पते पेड़ में
निकल आयीं कई-कई डालियाँ
फिर भी कभी तुमने उन्हें दिल से
चुन कर अलग नहीं किया
खुद के साथ सबको धोते रहे
जर्जर शब्दों को अर्थ देते गए
सच बताना तुम मेरे कौन हो?
बाप...दोस्त ...या सखा....
जब मुझे आगे की ज़मीन दिखनी बंद हुई
और में चुने फूलों की लाशें तीर आई
नदी की काली गहराई में
तब मेरे आक्रोश की यातना
बुझाई तुमने अपार ममत्व से
और दिखाया आकाश का निर्धूम नीलापन ....
आगे सब तो तुम जानते हो
मेरी शाश्वत दिशायें तुम्हे मालूम हैं
और मुझमें हमेशा तुम्हारी झीनी सफ़ेद याद
तुम मेरे बाप हो
और मैं तुम्हारी बेटी
बस इतना ही नहीं है अपना नाता