ग़म को पोशीदा ख़ुशी आम करे
ज़र्फ़वाला तो येही काम करे
ये समन्दर है तश्नालब कितना
लहर में कितनी जाँ तमाम करे
हुस्न की भी अजीब ख़्वाहिश है
चाहता इश्क़ को गुलाम करे
उसकी रहमत भी यक़ीनन होगी
नेक नीयत से अगर काम करे
तेरी नज़र पे भी मुकदमा हो
तेरी नज़र तो क़त्लेआम करे