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कल फिर एक तारीख है / ओम पुरोहित ‘कागद’

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कल फिर
एक तारीख है
कल फिर
दूध वाला
परचून वाला
पान वाला
और न जाने कौन-कौन सी
बला वाला
पैसे मांग ले जाएगा।
कुछ बच्चों की स्कूल फीस में
कुछ पानी-बिजली के बिल में
जाते-जाते
वेतन चुक जाएगा
और यूं उसका सफर
अधर में रूक जाएगा।
कल फिर तुम
अपनी साड़ी के लिए
बच्चों की डेस के लिए
अपनी सहेलियों की
उधार चुकाने के लिए
पैसे मांगोगी
मैं
नहीं होने की बात कहूंगा
तुम रूठोगी
मैं मनाउंगा
तुम मान जाओगी
फिर मैं हंसूंगा
तुम हंसोगी
बस यूं ही
जिंदगी
एक माह और खिसक जाएगी।
उसके बाद
फिर एक तारीख आएगी
तुम्हारी महत्वकांक्षाएं
और
घर की जरूरतें
मूंह बायेगी
नतीजा
तुम्हे पता है
इस लिए निराश मत होना
यह वह धारे हैं
जो यूं ही बहते हैं
बस इसी को
हम जिंदगी कहते हैं।