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आठ मुक्तक / गिरिराज शरण अग्रवाल

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1.
शोर बढ़ता जा रहा है शहर के माहौल में
मौन अपना तोड़ लेकिन गीत बन, नारा न बन
आस्माँ में जोत की रेखा बना पर जल बुझा
दीप-माला बन के जी, टूटा हुआ तारा न बन

2.
इस तरह बढ़-चढ़ के क्यों चर्चा अमावस की करें
रात काली ही सही, पर रोशनी थोड़ी नहीं
जिंदगी को चार दिन से मानने वालो सुनो
गर न भटकन में कटे तो जिंदगी थोड़ी नहीं

3.
वह युग जो जा चुका है, उसे मत भुलाइए
अच्छाइयाँ बहुत थीं, पुराने के साथ भी
दुनिया से अपनी दूरियाँ, पहले मिटाइए
हम अपने साथ भी हैं, ज़माने के साथ भी


4.
आचरण में मोम की नर्मी भी हो, फौलाद भी
फूल बनकर म्यान में तलवार रहना चाहिए
कब समय की माँग क्या हो, यह पता चलता नहीं
आदमी को हर घड़ी तैयार रहना चाहिए


5.
मिट न पाई आदमी से आदमी की दूरियाँ
सब घरों में एक जैसी जिंदगी पहुँची नहीं
बल्ब घर का ऑन करके देखिए, फिर सोचिए
कौन से कोने हैं, जिनमें रोशनी पहँची नहीं

6.
घर बंद अगर है तो सुगंधित नहीं होगा
खुशबुएँ हवा में कभी रुकने नहीं पातीं
फल चाहिए तो फिर हाथ बढ़ाना है ज़रूरी
शाखाएँ तो माली, कभी झुकने नहीं आतीं

7.
आस्माँ मैला हुआ, पानी हवा दूषित हुए
मिटि्टयों में ज़हर ऐसा क्या कभी पहले भी था
रिश्ते-नाते वह नहीं हैं जिनको सुनते आए हैं
आदमी जो आज है वह आदमी पहले भी था

8.
रात कटनी चाहिए, सूरज निकलना चाहिए
रोशनी आ जाएगी घर में दरीचा हो न हो
तुम निरालेपन की धुन में क्यों लगे हो दोस्तो
काम हो अच्छे से अच्छा, वह अनोखा हो न हो