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रस्मे-उल्फ़त को निभाते जाइये / कुमार नयन

रस्मे-उल्फ़त को निभाते जाइये
दर्द सहते मुस्कुराते जाइये।

जब तलक है जिस्म में बाक़ी लहू
दिल चराग़ों-सा जलाते जाइये।

मेरी शुहरत रोज़ बढ़ती जायेगी
आप मेरे पास आते जाइये।

याद रखिये सिर्फ दुनिया के करम
नेकियां अपनी भुलाते जाइये।

हमने तो माना कि हम बदकार हैं
आप क्या हैं ये बताते जाइये।

इम्तिहां ही इम्तिहां है उम्र भर
खुद को हर पल आज़माते जाइये।

लुट गया गर सब 'नयन' जी आपका
अपनी ग़ज़लें गुनगुनाते जाइये।