भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
वांगतू-करछम के पहाड़ / कुमार कृष्ण
Kavita Kosh से
वांगतू-करछम: हिमाचल प्रदेश के किन्नौर जिले के वे स्थान जहां इन दिनों जयप्रकाश विद्धुत परियोजनाएँ बन रही हैं
उन्होंने नहीं सोचा था कभी
एक दिन आएगा कोई जयप्रकाश
ख़त्म कर देगा एक झटके में
उनकी सदियों पुरानी ठसक
बारूद भरने वाले हाथ नहीं जान सकते
कैसे रोते हैं पहाड़
चीख़ते हुए, कराहते हुए पहाड़
मरते हैं दिन में सौ-सौ बार
जयप्रकाश तुम ख़त्म कर रहे हो
जिन पहाड़ों का अस्तित्व
वे साध रहे हैं अन्दर ही अन्दर एक प्रलय-राग
सुनो उस राग की आग
समझो धरती पर गिरते
उनके आँसुओं का आक्रोश
पहाड़ नाना-नानी, सत्तू-पानी
गुड़धानी, सृष्टि की कहानी
मनुष्यता की आधानी
सभी कुछ एक साथ हैं
जंगल का विश्वास हैं पहाड़
मनुष्य का श्वास हैं पहाड़
नदी की आस हैं पहाड़
जीवन की प्यास हैं पहाड़।