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Kavita Kosh से
एक प्याली शराब की-सी है
चाँद का रूप, रंग केसर का
. . .
चोटियों पर हँसी चमक उठती
शून्य में पायलें झमक उठातींउठतीं
दुग्ध-से गौर निर्झरों के बीच
देह की द्युति-तड़ित दमक उठती