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सींव / निशान्त

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<poem>
सींव भाऊं किणीं
देश री हुवै का
प्रदेश री
बीं रै आर-पार
दूर-दूर तांई
कीं नीं हुवै
बदळेड़ो

न तो माटी रो रंग
न पेड़-पौधा
न लोगां रो पै ’राण
न बोली

‘साइन बोर्ड’ नीं टंगेड़ो हुवै तो
कीं ठा नीं पड़ै

फेर सींव मौजद हुवै
सो कीं बांटती ।
</poem>
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