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देह / भाग 1 / शरद कोकास

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अपने भाईयों के बीच अकेली बहन थी पृथ्वी
जिसकी उर्वरा कोख में भविष्य के बीज थे और चांद उसका इकलौता बेटा
जन्म से ही अपना घर अलग बसाने की तैयारी में था
इधर आसमान की आँखों में अपार विस्मय
कि सद्यप्रसूता पृथ्वी की देह
अपने मूल आकार में वापस आने के प्रयत्न में
निरंतर नदी पहाड़ समंदर और चटटानों में तब्दील हो रही है रसायनों से लबालब भर चुकी है उसकी छाती और मीथेन,नाइट्रोजन,ओषजन युक्त हवाओं में सांस ले रही है वो
यह वह समय था देह के लिए
जब देह जैसा कोई शब्द नहीं था
शीतल हवाएँ कल कहाँ थी
कल यही मिटटी नहीं थी नहीं था यही आकाश
आज नदी में बहता हुआ जल कल नहीं था उस तरह देह में भी नहीं था वह अपने वर्तमान में
कहीं कुछ तय नहीं था कि उसका कौन सा अंश
किस देह में किस रुप में समाएगा
देह के लिए जीवन की वह पहली पुकार थी
कभी अंतरिक्ष से आती सुनाई देती जो
कभी समुद्रतलों के छिछले पानी से आग्रह था जिसमें भविष्य की यात्राओं के लिए साथ का
देह और जीवन की सहयात्रा जो सहस्त्राब्दियों से जारी है
जानना तो क्या सोचना भी बहुत मुश्किल
कि वे ठीक हमारी तरह दिखाई देते थे
हमारे अवयवों की तरह हरकतें होती थीं जिनके अवयवों मे मेंहमारे देहलक्षणों की तरह थे जिनके देहलक्षण
और उनका भी वही देहधर्म था जो आज हमारा है
संत - महात्माओं वैज्ञानिकों और विचारकों के लिए
देह जो सदियों से स्वयं अपना हल ढूंढने की कोशिश में है
जो सजीवों की तरह जन्म लेती है बढ़ती है अपने आसपास से आहार लेकर
पुनरुत्पादन की प्रक्रिया से गुजरती निरंतर
हर जिज्ञासु की आँख को आमंत्रित करती
इधर प्रयोगशाला में शीशे के मर्तबानों से झांकती भ्रूण देह
जिसे किसी देह ने ही दान किया होता है
अपने जन्म से पूर्व की कथा का बयान करती है माइक्रोस्कोप के नीचे प्लेट में मुस्कराती हैं कोशिकाएँ
हमसे है जीवन हमीं से है देह
कोशिकाएँ जो सजीव हैं सजीव देह के भीतर
और निर्जीव बाहर इस देह के फिर भी वे जन्म दे सकती हैं नई कोशिकाओं को
किसी आत्मा के सहयोग के बगैर ही
चांद बढ़ता है जैसे धूप बढ़ती है देह बढ़ती है
अपने चरम में होती है जो देह के चरम में
फिर पहाड़ की चोटी से उतरती देह की थकान में धीरे धीरे दम तोड़ती है देह की कोशिकाएँ
अंगों के साथ छोड़ने की उम्र में साथ छोड़ती हैं
और एक दिन उसी देह के साथ मर जाती हैं
मस्तिष्क के घोंसले में बैठी इच्छाएँ भावनाएँ
देह के साथ मर जाती वासनाएँ मनुष्य की और दोबारा कभी जन्म नहीं लेती हैं फिर भी डरती है हर देह मरने से
और इस भय के चलते हर रोज़ मरती है
आँसुओं के अथाह समंदर लहराते हैं जिसमें
इसकी किलकारियों में झरने का शोर सुनाई देता है
माँसपेशियों मे उभरती हैं चटटानें और पिघलती हैं हवाओं से दुलराते हैं हाथ त्वचा महसूस करती है
पाँवों से परिक्रमा करती यह अपनी दुनिया की
और वे इसमें होते हुए भी इसका बोझ उठाते हैं