भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

वसन्त / कृष्णा वर्मा

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

1
अधर -धरी
चुप्पियाँ करें बातें
खिलखिलाई
मन तेरी आहटें
बाँटें प्रेम सौगातें।
2
खिलते टेसू
हृदय पुलकित
हो सुरभित
फागुन के स्वागत
बिखेरते अबीर।
3
प्रीत उल्लास
फैले स्वर्णिम आभा
हो अग्निभास
अचम्भित है वन
अरुणाभा पलाश।
4
अद्भुत कला
तेरी गुलमोहर
सूर्य तपाए
तू हो दैदीप्यमान
महकता ही जाए।
5
स्वर्ण रश्मियाँ
तिरीं जब ताल पे
धूप ने रखे
प्रीत भीगे अधर
लहरों के गाल पे।
6
अद्भुत रिश्ता
सूर्य की लालिमा से
रचता चाँद
समुद्र की देह पे
चाँदनी का नचन।
7
मुदित ऋतु
भरती लताओं की
फूलों से गोद
बजाएँ ताली झूमें
गाएँ पत्ते सोहर।
8
वक़्त से हारे
रुलते तिनकों से
बुने चिड़िया
अपना आशियाना
खुशियों का ख़ज़ाना।
9
बेरंग जल
मटमैली मिट्टी का
दृड़ निश्चय
खिलाए बगिया में
रंगबिरंगे फूल।
10
भोर की बेला
ओस चादर ओढ़े
भीगा प्रभात
धूप देखके नाची
किरणों की बारात।
11
डोलें चिनार
अनारों के चमन
छलके जब
बुलबुल का कंठ
उतरे है बसंत।
12
तुमसे बँधा
मेरा मन प्रिय ज्यों
बँधा है रवि
जन्म-जन्मांतर से
किरणों के बंधन।
13
पुष्प रैलियाँ
बागों में भरा जोश
उन्मादी हवा
देखकर तितलियाँ
खो बैठीं निज होश।
14
फुनगी पर
सिहरा अँधियार
टहनी पर
पंछी की सुगबुग
गुहारे भिनसार।
-0-