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अंधा कुआँ / ऋषभ देव शर्मा

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देखो !
अंधा कुआं होना भी
कोई दुर्भाग्य नहीं है,
गहराई में से
आती हुई प्रतिध्वनियाँ
माध्यम बनती है
स्वर की साधना का;
स्वर –
जो
हर अँधेरे में
बिजली के फूल जैसा
खिलता है
हर कुहरे को चीरता हुआ,
और फिर
रात के स्याह शालू पर
लिख देता है –
रोशनी ! रोशनी !!रोशनी !!!

रोशनी –
जो
चाँद,
तारे और
दिए बनती है,
और फिर
सूरज भी;
सूरज –
जो
ढलने का
भ्रम तो देता है
पर कभी ढलता नहीं !