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अनंत यात्रा / आकांक्षा पारे

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अपनी कहानियों में मैंने
उतारा तुम्हारे चरित्र को
उभार नहीं पाई
उसमें तुम्हारा व्यक्तित्व।

बांधना चाहा कविताओं में
रूप तुम्हारा
पर शब्दों के दायरे में
न आ सका तुम्हारा मन

इस बार रंगों और तूलिका से
उकेर दी मैंने तुम्हारी देह

असफलता ही मेरी नियति है
तभी सूनी है वह तुम्हारी आत्मा के बिन