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अनाम देश / वाल्ट ह्विटमैन / दिनेश्वर प्रसाद

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इन राज्यों से दस हज़ार वर्ष पहले और इन्हीं राज्यों के दस
हज़ार वर्षों से कई गुना वर्ष पहले के राष्ट्र, युगों
के एकत्र गुच्छ जिनमें हमारे — जैसे पुरुष और — स्त्रियाँ
बढ़ कर बड़े हुए, अपने लिए निर्धारित मार्ग की यात्रा
सम्पन्न की और आगे बढ़ गए
कैसे विशाल सुनिर्मित नगर, कैसे सुव्यवस्थित गणराज्य,
कैसी पशुपालक जनजातियाँ और यायावर जातियाँ
कैसे-कैसे इतिहास, शासनकर्ता, वीर जो सम्भवतः दूसरे सबों से बढ़कर थे,
कैसे-कैसे विधान, प्रथाएँ, सम्पदा, कलाएँ, परम्पराएँ,
किस- किस प्रकार के विवाह, कैसी-कैसी वेशभूषाएँ,
कैसी-कैसी शारीरिक संरचनाएँ और कपाल-आकृतियाँ
उनके यहाँ स्वतन्त्रता और दासता के रूप क्या थे, वे
मृत और आत्मा के विषय में क्या सोचते थे,
उनमें कौन वाक्पटु और बुद्धिमान थे, कौन रूपवान
और कवित्व-प्रवण, कौन पशुवत् और अविकसित,
कोई भी निशान, कोई भी अभिलेख बचा नहीं रह
गया है, तब भी सब कुछ बचा है ।

ओह् ! मैं जानता हूँ कि वे पुरुष और स्त्री अकारण नहीं थे,
जैसे हम भी अकारण नहीं हैं,
मैं जानता हूँ कि वे पूरी तरह विश्व की योजना के
उतने ही अँग हैं, जितने कि हम उनके अँग हैं ।

वे सुदूर अवस्थित हैं, तब भी मेरे समीप अवस्थित हैं,
कुछ अण्डाकार मुखों वाले — ज्ञानी और शान्त
कुछ नग्न और बर्बर, कुछ विशाल कीट-समूहों जैसे,
कुछ शिशिरवासी, पशुपालक, कुलपति, अश्वारोही,
कुछ जँगलों में आखेट करने वाले, कुछ कृषिफ़ार्मों पर
शान्तिपूर्वक निवास करते, परिश्रम करते, फ़सल काटते, बखार भरते,
कुछ पक्की सड़कों पर चलते मन्दिरों के बीच, महलों, कारख़ानों,
पुस्तकालयों, समारोहों, न्यायालयों, रँगशालाओं, अद्भुत स्मारकों के बीच ।

क्या वे अरबों अरब लोग सचमुच जा चुके हैं ?
क्या धरती के पुरातन अनुभवों से सम्पन्न वे महिलाएँ जा चुकी हैं ?
क्या उनके जीवन, नगर, कलाएँ हम पर निर्भर हैं ?
क्या उन्होंने अपने लिए कुछ भी अच्छा उपलब्ध नहीं किया है ?

मेरा विश्वास है कि उन पुरुषों और स्त्रियों में जो अनाम
देशों में निवास करते थे, प्रत्येक व्यक्ति यहाँ या अन्यत्र,
हमारे लिए अदृश्य रूप में इस समय भी मौजूद है,
ठीक उसी अनुपात में जिस अनुपात में प्रत्येक पुरुष या
स्त्री ने जीवन में विकास किया और जिससे
हो कर जीवन में उस पुरुष या स्त्री ने अनुभव किया,
आत्म-विकास किया, प्रेम किया, पाप किया ।

मेरा विश्वास है कि वही मेरे राष्ट्रों या स्वयं मेरा अन्त नहीं था;
उनकी भाषाओं, सरकारों, विवाह, साहित्य, उत्पादों,
खेलों, युद्धों, रीतियों, अपराधों, कारागारों, दासों, वीरों, कवियों,
मैं सोचता हूँ कि उनके परिणाम विलक्षण
रूप से अब तक अदृष्ट संसार में प्रतीक्षा कर रहे हैं, जो
कि इस दृष्ट संसार में उनके लिए
जो सँचित था, उसके प्रतिरूप हैं,
मैं सोचता हूँ कि उनसे वहाँ मेरी भेंट होगी,
मैं सोचता हूँ कि मुझे वहाँ उन अनाम देशों का प्रत्येक
पुराना विवरण मिल जाएगा ।

मूल अँग्रेज़ी से अनुवाद : दिनेश्वर प्रसाद

लीजिए, अब यही कविता मूल अँग्रेज़ी में पढ़िए
                Walt Whitman
               Unnamed Lands

NATIONS ten thousand years before These States, and
many times ten thousand years before These States,
Garnered clusters of ages, that men and women like
us grew up and travelled their course, and passed on;
What vast-built cities — What orderly republics —
What pastoral tribes and nomads,
What histories, rulers, heroes, perhaps transcending all others,
What laws, customs, wealth, arts, traditions,
What sort of marriage—What costumes — What
physiology and phrenology,
What of liberty and slavery among them — What
they thought of death and the Soul,
Who were witty and wise — Who beautiful and poetic
— Who brutish and undeveloped,
Not a mark, not a record remains — And yet all remains.

O I know that those men and women were not for
nothing, any more than we are for nothing,
I know that they belong to the scheme of the world
every bit as much as we now belong to it, and as
all will henceforth belong to it.

Afar they stand — yet near to me they stand,
Some with oval countenances, learned and calm,
Some naked and savage — Some like huge collections of insects,
Some in tents — herdsmen, patriarchs, tribes, horse-men,
Some prowling through woods — Some living peacea-
bly on farms, laboring, reaping, filling barns,
Some traversing paved avenues, amid temples, palaces,
factories, libraries, shows, courts, theatres, won-derful monuments.

Are those billions of men really gone?
Are those women of the old experience of the earth gone?
Do their lives, cities, arts, rest only with us?
Did they achieve nothing for good, for themselves?

I believe of all those billions of men and women that
filled the unnamed lands, every one exists this
hour, here or elsewhere, invisible to us, in exact
proportion to what he or she grew from in life,
and out of what he or she did, felt, became, loved, sinned, in life.

I believe that was not the end of those nations, or any
person of them, any more than this shall be the
end of my nation, or of me;
Of their languages, phrenology, government, coins, med-
als, marriage, literature, products, games, juris-
prudence, wars, manners, amativeness, crimes,
prisons, slaves, heroes, poets, I suspect their re-
sults curiously await in the yet unseen world —
counterparts of what accrued to them in the seen world,
I suspect I shall meet them there,
I suspect I shall there find each old particular of those unnamed lands.