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अनावृष्टि - १९८७ / दिनेश कुमार शुक्ल

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दिल्ली हिन्दुतान का
सबसे हरा-भरा शहर है
और हिन्दुस्तान
दुनियाँ का एक सूखा देश

दिल्ली के आकाश में
हरे भरे बाग हैं
बागों में फव्वारे
फव्वारों में रोशनी
और रोशन फव्वारों में नहा रही हैं
काली सफेद प्रेत आकृतियाँ

झरनों में रोशनी
लाई गई है
अस्सी करोड़ आँखों
को बुझा कर

दिल्ली की जमीन पर
मगर
जब चलती है लू
तो चमड़ी सूखी छाल-सी
चरचरा कर उधड़ती चली जाती है
और दिल और दिमाग में
रेत और रेत और रेत भर जाती है

पानी कहीं नहीं है
सिर्फ प्रेत आत्माओं के
फव्वारों के मायाजल को छोड़कर
बादल वृक्ष पशु आदमी
निपानी कर दिये गये हैं--
हीरे का जैसे उतरते ही पानी
वह बन जाता है कोयला

आदमीयत पिघल रही है
शाहराहों में
गाढ़े चिपचिपे तारकोल सी,
टुकड़ों-टुकड़ों में
फटने को है पूरा देश --
अकाल में दरक रही है
धरती

आओ दोस्तो
मिल कर हम कोशिश करें,
कि अपने फेफड़ों की धौंकनी बनायें
और अपनी सम्मिलित
सांसों के जोर से
फूंक-फूंक कर
भटके मानसून को
फिर अपने आकाश में
वापस खींच लायें

ताकि बरसे पानी फिर
हरसें फिर आदमी, पशु, वृक्ष
फटी हुई धरती के
सीने के घाव भरें
खत्म हो प्रेतों का इन्द्रजाल

मिलकर हम फिर से
सरसायें अपना उपवन,
जीवन को गरिमा
आँखों को रोशनी
आशा भविष्य को
और हिम्मत वर्तमान को
फिर से लौटायें,
ताकि सभी जन
फिर से हंसें और गायें।