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अपनी धूप के लिए / प्रियंका पण्डित

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जिस दिन मैं
सम्भव हो जाऊंगी
ख़ुद के लिए
उस दिन मैं निमंत्रित करूंगी
अक्षरों को
तमाम ख़ुशबुओं को हवाओं के साथ पुकारूंगी
पानी की बूंद-बूंद में
ज़मीन पर पकती हुई रेशा-रेशा भाप की तरह
बिना किसी तरह का रास्ता बनाए
मैं स्निग्ध आसमान पर
एक कविता रचना चाहूंगी
सिर्फ़ अपनी धूप के लिए...