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अपनी बात / वीरेन्द्र खरे अकेला

No change in size, 12:55, 27 सितम्बर 2011
स्व. दुष्यन्त कुमार जी के ग़ज़ल संग्रह ‘साये में धूप’ से प्रभावित होकर मैंने 1991 से ग़ज़लें कहना शुरू किया और आज तक कह रहा हूँ । इस संग्रह में 1991 से 1997 तक मेरे द्वारा कही गई ग़ज़लों में से वे ग़ज़लें हैं जो मुझे कुछ ठीक-ठाक लगती हैं और लगता है कि इन्हें दूसरों को भी पढ़वाया जा सकता है ।
मैं अन्य विधाओं में भी थोड़ा बहुत गूद-गाद लेता हूँ किन्तु ग़ज़ल मेरी प्रिय विधा है, इसलिए क्योंकि वह सभी तरह की भावनाओं, विचारों, समस्याओं और विदू्रपताओं विद्रूपताओं को प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करने में पूर्ण समर्थ है । वह बेचैनी, निराशा और घुटन की भीषण दोपहर के विरूद्ध खड़ा एक शामियाना है । वह न जी पाने के बीच जीने का एक प्रयास है । वह पीड़ा को रसमय बनाने का एक यंत्र है ।
'''दर्दों की धूप आखि़र अब क्या बिगाड़ लेगी'''
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