भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

अब कहाँ चाँद-सितारे हैं नज़र के आगे! / गुलाब खंडेलवाल

Kavita Kosh से
Vibhajhalani (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 06:22, 22 जून 2009 का अवतरण (नया पृष्ठ: अब कहाँ चाँद-सितारे हैं नज़र के आगे! बस उस तरफ के किनारे हैं नज़र क...)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

अब कहाँ चाँद-सितारे हैं नज़र के आगे!

बस उस तरफ के किनारे हैं नज़र के आगे


कोई कुछ भी ही कहे हमने तो यही देखा है

ख़्वाब ही ख़्वाब ये सारे हैं नज़र के आगे


तू भले ही है छिपा ताजमहल में अपने

तेरे पापोश तो, प्यारे! हैं नज़र के आगे


कौन कहता है तुझे प्यार नहीं है हमसे!

क्यों ये रह-रहके इशारे हैं नज़र के आगे!


कभी खुशबू से ये दिल उनका भी छू लेंगे

रंग तूने जो पसारे हैं नज़र के आगे