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"अरे वसंत!/ज्योत्स्ना शर्मा" के अवतरणों में अंतर

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कैसी करो ठिठोली
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लिए घूमते
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ये पवन निगोड़ी
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मेरे सखा वसंत
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कहाँ बसाऊँ
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बसे हैं मेरे कन्त !
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अरे फागुन
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क्या गुनूँ तेरे गुन
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गुनगुना ही उठे
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रुत हुई मगन ।
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सुनो रे पिया
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अजब जादूगर
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होरी मचाई
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न रंग न गुलाल
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हो गई मैं तो लाल ।
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जलधारा -सी
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उतरूँ जो निर्मल
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तृषित धरा
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संग में हरषाए
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मुदित मना गाए ।
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मैं बदरी -सी
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अम्बर में छा जाऊँ
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तपा सताए
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रवि- कर निकर
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बरसूँ सरसाऊँ ।
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अरे सूरज !
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जाने कहाँ खो गया
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शीत सिहरा
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कोहरे की चादर
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ओढ़कर सो गया ।
  
 
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16:55, 7 फ़रवरी 2018 के समय का अवतरण


49
बीज खुशी के
मैं बो आई थी कल
उग आएँगे
कुछ पौधे प्यारे- से
प्रेम- रस भीने -से ।
50
अरे वसंत !
कैसी करो ठिठोली
लिए घूमते
ये पवन निगोड़ी
अनहोनी न हो ले ।
51
न मान करो
मेरे सखा वसंत
कहाँ बसाऊँ
तुम्हीं कहो तो ,मन
बसे हैं मेरे कन्त !
52
अरे फागुन
क्या गुनूँ तेरे गुन
सरस मन
गुनगुना ही उठे
रुत हुई मगन ।
53
सुनो रे पिया
अजब जादूगर
होरी मचाई
न रंग न गुलाल
हो गई मैं तो लाल ।
54
जलधारा -सी
उतरूँ जो निर्मल
तृषित धरा
संग में हरषाए
मुदित मना गाए ।
55
मैं बदरी -सी
अम्बर में छा जाऊँ
तपा सताए
रवि- कर निकर
बरसूँ सरसाऊँ ।
56
अरे सूरज !
जाने कहाँ खो गया
शीत सिहरा
कोहरे की चादर
ओढ़कर सो गया ।