भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

"आँखें / पूनम तुषामड़" के अवतरणों में अंतर

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज
(नया पृष्ठ: {{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=पूनम तुषामड़ |संग्रह=माँ मुझे मत दो / पूनम तुषाम…)
 
 
पंक्ति 17: पंक्ति 17:
 
शायद ....हाँ
 
शायद ....हाँ
 
क्या किसी ने इसे मारा है?
 
क्या किसी ने इसे मारा है?
इसके मालिक ने...
+
इसके मालिक ने...?
  
 
इसकी देह पर भी निशान है  
 
इसकी देह पर भी निशान है  
पंक्ति 52: पंक्ति 52:
 
जल्दी से पल्लू से मुँह पोंछती है
 
जल्दी से पल्लू से मुँह पोंछती है
  
डाकिया-हिचकिचाकर
+
डाकिया, हिचकिचाकर
 
बिटिया! चेहरे पर ये घाव?
 
बिटिया! चेहरे पर ये घाव?
  

20:08, 13 जुलाई 2011 के समय का अवतरण

सामने खूँटे से बंधी गाय
गाय की काली-काली,
बड़ी-बड़ी आँखें
कितनी सुंदर

पर यह क्या?
गाय की आँख में आँसू।
क्या...गाय भी रो रही है?

शायद ....हाँ
क्या किसी ने इसे मारा है?
इसके मालिक ने...?

इसकी देह पर भी निशान है
चोट के।

वह सोच रही है
शायद दूध का विरोध
सींग मारती होगी।

तभी अश्क भरी आँखों से
उसने ख़ुद को निहारा
अपनी देह के ज़ख़्मों को
नज़र में उतारा
एक धीमी-सी सिसकी...

उसने फिर गाय को निहारा
गाय की आँख में आँसू तो हैं
पर वह बेचैन है,
क्रोधित है ।

यह क्या?
वह जोर-जोर से रंभा रही है...
खूँटे से रस्सी तोड़ने को
उछल कूद मचा रही है ।

अरे-अरे ....यह क्या?
गाय खूँटा तोड़ गई है ।
वह भाग रही है...।
वह भाग गई है...।

तभी....।
ठक-ठक....।
अरे डाकिया बाबू?
जल्दी से पल्लू से मुँह पोंछती है

डाकिया, हिचकिचाकर
बिटिया! चेहरे पर ये घाव?

कुछ नहीं काका
कल आँगन में फिसल गया था पाँव
चिट्ठी पकड़ती है
चुन्नी से खुद को ढाँपती है
काँपती है ।

और फिर क़ैद हो जाती है
बंधन तोड़ने को नहीं
जोड़ने को ।