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"आँख से दूर न हो / फ़राज़" के अवतरणों में अंतर

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तेरी बख़्शीश तेरी दहलीज़ पे धर जायेगा  
 
तेरी बख़्शीश तेरी दहलीज़ पे धर जायेगा  
  
डूबते डूबते कश्ती तो ओछाला दे दूँ  
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डूबते डूबते कश्ती को उछाला दे दूँ  
 
मैं नहीं कोई तो साहिल पे उतर जायेगा  
 
मैं नहीं कोई तो साहिल पे उतर जायेगा  
  

21:26, 14 फ़रवरी 2010 का अवतरण

आँख से दूर न हो दिल से उतर जायेगा
वक़्त का क्या है गुज़रता है गुज़र जायेगा

इतना मानूस न हो ख़िल्वत-ए-ग़म से अपनी
तू कभी ख़ुद को भी देखेगा तो डर जायेगा

तुम सर-ए-राह-ए-वफ़ा देखते रह जाओगे
और वो बाम-ए-रफ़ाक़त से उतर जायेगा

ज़िन्दगी तेरी अता है तो ये जानेवाला
तेरी बख़्शीश तेरी दहलीज़ पे धर जायेगा

डूबते डूबते कश्ती को उछाला दे दूँ
मैं नहीं कोई तो साहिल पे उतर जायेगा

ज़ब्त लाज़िम है मगर दुख है क़यामत का "फ़राज़"
ज़ालिम अब के भी न रोयेगा तो मर जायेगा