भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

आइए, कुछ नया करें / मनोज श्रीवास्तव

Kavita Kosh से
Dr. Manoj Srivastav (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 12:43, 22 जून 2010 का अवतरण (नया पृष्ठ: {{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार= मनोज श्रीवास्तव |संग्रह= }} {{KKCatKavita}} <poem> '''आइए, कुछ न…)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

आइए, कुछ नया करें


कनाट प्लेस की
अति जनसंकुल जगह पर
आप गाजे-बाजे
बैनर-इश्तेहार समेत
अपनी वैध-अवैध प्रेमिका को नंगाकर
माइक पर प्रेमालाप करें,
सच मानिए--
आप गिनीज बुक की
सुर्खियों में होंगे

ब्याह की चिर-आस में
गदराई, फुलझडियाई
और हौले-हौले पछताकर
कुम्हलाई, मुरझाई, पथराई
अनब्याही अधेड़ लड़कियों को तज
आप मोहल्ले की कुतियों से
ब्याह रचाएं
हनीमून मनाने स्विटजरलैंड जाएं,
आप बेशक! लोगों के लिए फैन होंगे
मीडियाजनों और खबरनवीसों से घिरे होंगे
'सर' और महाशय होंगे

लोकतंत्र का तकाज़ा है
कि आइए कुछ नया करें
अनैतिहासिक काम डटकर करें,
यानी, अपने बच्चों की अकाल मौत पर
प्रीतिभोज का आयोजन करें,
परिजनों की शादी और
शिशु के जन्म पर
काले पोशाक पहन मातम मनाएँ,
फसल सूख जाए तो
खाली खलिहानों में पिकनिक मनाएँ
और अगर फसल लहलहाएं तो
उनकी होली जलाएँ

आइए, कुछ नया करें
आतंकवादियों पर दया करें,
उन्हें मेडल और उपाधि दें
आजीवन पेन्शन, भेंट आदि दें

किसी मानव बम के फटने पर
उसके 'शहीद' होने पर
उसे देशव्यापी भावभीनी श्रद्धांजलि दें,
उसकी माल्यार्पित फोटो
संसद के केन्द्रीय कक्ष में लगाएँ,
उसकी स्मृति में
शहीद उद्यान लगाएँ,
उसके आश्रितों को
मानार्थ संरक्षण दें

आइए, कुछ ऐसा करें
आदर्श देशभक्तों जैसा करें
यानी, खूँखार आतंकवादियों का
जघन्य देशद्रोहियों का
राष्ट्रीय सम्मेलन बुलाएं,
उनकी मौज़ूदगी में
क़ुरान और गीता जलाएँ,
बुद्ध, अशोक, अकबर, गाँधी के पुतलों पर
जूतों की मालाएं चढ़ाएं,
साखियों, सरमनों
ऋचाओं और धम्मों के रिकार्ड बजा
उन पर ठठा-ठठा
गलाफोड़ हंसी हँसें
ताने और फब्तियाँ कसें

आइए, कर्मवादी बनेँ
अपसंस्कृति की आँधी बनेँ
अर्थात टी.वी. और इन्टरनेट पर
आदमगोश्त के कबाब की विधियाँ सिखाएं,
सेंधमारी, हत्या, डकैती के गुर बताएँ
बलात्कार का सीधा प्रसारण करें,
आइए, दूरदर्शन के उदारीकरण के दौर में
जनानेंद्रियों के आदिम कार्य दर्शाएं,
साँड़ों को कमसिन लौंडियों पर,
कामांध मर्दों को
गाय-गोरुओं पर चढ़वाएँ

आइए, ऐसे नायाब-बेमिसाल
नानाविध नुस्खों पर अमल करें,
मान और मुकुट के हकदार
अपराध-शिरोमणियों के बदले
बेज़ुबान, बेमुकाम बलात्कृतों
अपाहिज़ों, यतीमों, अपहृतों
के सिर कलम करें
और क्षितिज के पार
इस पल्लवित संस्कृति को
बुलंद करें.! (रचनाकाल: ०७-०९-१९९९)