भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

आए हैं जिस मक़ाम से उसका पता न पूछ / इन्दु श्रीवास्तव

Kavita Kosh से
द्विजेन्द्र द्विज (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 22:34, 6 मार्च 2010 का अवतरण

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

आए हैं जिस मक़ाम से उसका पता न पूछ
रुदादे-सफ़र[1] पूछ मगर रास्ता न पूछ

गर हो सके तो देख ये पाँवों के आबले[2]
सहरा कहाँ था और कहाँ ज़लज़ला न पूछ

वाँ[3] से चले हैं जबसे मुसलसल[4] नशे में है
ले जाए किस दयार में हमको नशा न पूछ

वाक़िफ़ नहीं है इश्क़ की पेचीदगी से तू
है ये शुरू कहाँ से कहाँ पे सिरा न पूछ

मौसम गए सुकून गया ज़िन्दगी गई
दीवानगी की आग में क्या-क्या गया न पूछ

किसकी तलाश कैसी हम्द कैसी बन्दगी
है धूप में कि छाँव में मेरा ख़ुदा न पूछ

जब वो नज़र के बीच जले है चराग़-सा
ख़्वाहिश न कोई पूछ कोई इल्तिजा न पूछ

>
शब्दार्थ
  1. यात्रा की कहानी
  2. छाले
  3. वहाँ
  4. निरंतर