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इस क़दर भी तो मेरी जान न तरसाया कर / ग़ुलाम हमदानी 'मुसहफ़ी'

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इस क़दर भी तो मेरी जान न तरसाया कर
मिल के तन्हा तो गले से कभी लग जाया कर

देख कर हम को न पर्दे में तू छुप जाया कर
हम तो अपने हैं मियाँ गै़र से शरमाया कर

ये बुरी ख़ू है दिला तुझ में ख़ुदा की सौगंध
देख उस बुत को तू हैरान न रह जाया कर

हाथ मेरा भी जो पहुँचा तो मैं समझूँगा ख़ूब
ये अंगूठा तो किसी और को दिखलाया कर

गर तो आता नहीं है आलम-ए-बेदारी में
ख़्वाब में तू कभी ऐ राहत-ए-जाँ आया कर

ऐ सबा औरों की तुर्बत में गुल-अफ़शानी चंद
जानिब-ए-गोर-ए-ग़रीबाँ भी कभी आया कर

हम भी ऐ जान-ए-मन इतने तो नहीं ना-कारा
कभी कुछ काम तो हम को भी तू फ़रमाया कर

तुझ को खा जाएगा ऐ ‘मुसहफ़ी’ ये ग़म इक रोज
दिल के जाने का तू इतना भी ग़म खाया कर