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उत्सव / मलय रायचौधुरी / सुलोचना वर्मा

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तुम क्या कभी श्मशान गई हो अवंतिका ? क्या बताऊँ तुम्हें !
ओह वह कैसा उत्सव है, कैसा आनन्द, न देखो तो समझ नहीं पाओगी —
पञ्चांग में नहीं ढूँढ़ पाओगी ऐसा उत्सव है यह । कॉफ़ी की घूँट लेता हूँ |
अग्नि को घेर जींस-धोती-पतलून-बनियान व्यस्त हैं अविराम
मद्धिम अग्नि कर रही है तेज़ नृत्य आनन्दित होकर, धुएँ का वाद्ययन्त्र
सुनकर जो लोग अश्रुपूरित आँखों से शामिल होने आए हैं उनकी भी मौज़
अन्ततः शेयर बाज़ार में क्या चढ़ा, क्या गिरा, फिर टैक्सी
पकड़ सामान्य निरामिष ख़रीदारी पुरोहित की दी हुई सूची के अनुसार —
चलना श्मशान काँधे पर सबसे सस्ते पलंग पर सोकर लिपस्टिक लगाकर ...
ले जाएँगे एक दिन सभी प्रेमी मिल काँधे के ऊपर डार्लिंग ...

मूल बंगला से अनुवाद : सुलोचना वर्मा
लीजिए, अब मूल बंगला में यही कविता पढ़िए
           উৎসব

তুই কি শ্মশানে গিয়েছিস কখনও অবন্তিকা ? কী বলব তোকে !
ওহ সে কী উৎসব কী আনন্দ, না দেখলে বুঝতে পারবি না--
পাঁজিতে পাবি না খুঁজে এমনই উৎসব এটা । কফিতে চুমুক দিই।
আগুনকে ঘিরে জিন্স-ধুতি-প্যান্ট-গেঞ্জি মেতে আছে ননস্টপ
মিচকে আগুন তেড়ে নাচছে আনন্দ খেয়ে, ধোঁয়ার বাজনা
শুনে কাঁদো-চোখে যারা সব অংশ নিতে এসেছে তারাও মজা
শেষে শেয়ার বাজারে কী উঠল কী নামল আবার ট্যাকসি
ধরে ছোটো নিরামিষ কেনাকাটা পুরুতের দেয়া লিস্টি মেনে--
চলিস শ্মশানে কাঁধে চিপেস্ট পালঙ্কে শুয়ে লিপ্সটিক মেখে...
নিয়ে যাব একদিন সবাই প্রেমিক মিলে কাঁধের ওপরে ডারলিং...