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एक ओर परदों के नाटक / मुकुट बिहारी सरोज

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एक ओर परदों के नाटक एक ओर नंगे ।
राम करे दर्शक-दीर्घा तक आ न जाएँ दंगे ।

अव्वल मंच बनाया ऊँचा जनता नीची है
उस पर वर्ग-वर्ग में अंतर रेखा खींची है
समुचित नहीं प्रकाश-व्यवस्था अजब अँधेरा है
उस पर सूत्रधार को खलनायक ने घेरा है

पात्रों की सज्जा क्या कहिए, जैसे भिखमँगे ।
राम करे दर्शक-दीर्घा तक आ न जाएँ दंगे ।

नामकरण कुछ और खेल का, खेल रहे दूजा
प्रतिभा करती गई दिखाई लक्ष्मी की पूजा
अकुशल असंबद्ध निर्देशन-दृश्य सभी फीके
स्वयं कथानक कहता है, अब क्या होगा जी के

संवादों के स्वर विकलांगी कामी बेढँगे ।
राम करे दर्शक-दीर्घा तक आ न जाएँ दंगे ।

मध्यांतर पर मध्यांतर है कोई गीत नहीं
देश काल की सीमाओं को पाया जीत नहीं
रंगमंच के आदर्शों की यह कैसी दुविधा
उद्देश्यों के नाम न हो पाए कोई सुविधा

जन गण मन की जगह अंत में गाया हर गंगे ।
राम करे दर्शक-दीर्घा तक आ न जाएँ दंगे ।