भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

एक तुम्हारे जाने से / रंजन कुमार झा

Kavita Kosh से
Rahul Shivay (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 19:30, 1 अगस्त 2018 का अवतरण

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

दिल से रिक्त हुआ ज्यों सीना
एक तुम्हारे जाने से

वासंती थी फ़िजा-छटाएँ, मन -मयूर के घन तुम थे
ग्रीष्म ऋतु में सर्द हवा की बहकी हुई छुअन तुम थे
अब न रहा वो साल-महीना
एक तुम्हारे जाने से

चार नयन दो मधुर ख्वाब के बुनते आए जाले थे
पास हृदय था और नहीं कुछ प्रेम-गान मतवाले थे
टूट गई वो मधुरिम वीणा
एक तुम्हारे जाने से

नीड़ एक करने की जिद थी, चाह रही हम साथ रहें
सुख-दुख की सारी घड़ियाँ में, लिए हाथ में हाथ रहें
रास न आता है अब जीना
एक तुम्हारे जाने से