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एक थैली बूँदी... / शमशाद इलाही अंसारी

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पता नहीं मुझे आज
एक थैली बूँदी की याद
इतनी क्यों आ रही है..?
आज के दिन..
जब स्कूल में
बँटा करती थी..
तमाम उबाऊ क्रिया-कलापों और न्यूनतम स्तर के
पाखण्डों के बाद
बस प्रतीक्षा रहती थी
कब मिलेंगी
वो, गर्म-गर्म बूँदियों की
रस भरी थैलियाँ
जो, न जाने कब और कैसे
जुड़ गई थीं
गणतंत्र दिवस से ।
उन्हें लेकर मैं घर तक जाता
हर वर्ष, ख़ुशी-ख़ुशी ।
लेकिन..जब से मैं व्यस्क हुआ हूँ
न मुझे उस थैली का इंतज़ार रहता
और, न रहता किसी के
कथित
गणतंत्र का ।
शायद, आरोपित पर्व
वह कच्चे धब्बे मात्र हैं
जिन्हें, बरसात की
पहली बयार
धोकर, दिखा देती है
नाली का रास्ता ।

रचनाकाल : 26.01.2011