भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

एक नदी की कहानी / अवतार एनगिल

Kavita Kosh से
प्रकाश बादल (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 20:45, 18 जनवरी 2009 का अवतरण (नया पृष्ठ: {{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=अवतार एनगिल |एक और दिन / अवतार एनगिल }} <poem> उन दिनों ...)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

उन दिनों

किसनपुरा के करीब

एक निरंतर निनादित नदी रहती थी

मन की मौज में

कार्तिक की गुनगुनी धूप ओढ़कर
बाँस के जंगल

संग-संग बहती हथी

पारदर्शी पानी में

दिप-दिप जगमाते

नीले...... हरे ..... कत्थई पत्थर बिखेरते

सुनहरी धूप के सैंकड़ों दुखद रंग अ

किनारों पर
कभी-कभार .

घूपने दिख जाते हैं मछुआरे

डालते जाल

खूंचते तरल आँखों वाली
सुनहली मछलियाँ

धीरे-धीरे

बढ़ी भूख़
गहरे काले जल मे
बिछने लगा बारूद

और ... धमाकों के बाद

तिकोने कटाव वाले “रोके” पर

लूडी जाने लगीं डब-डब आँखों वाली

मरी जलपरियाँ

जिस दिन बारूद लगता

गाँव भर में
उतसाह का माहौल रहता

पास के कस्बे में
गिर जाते

मच्छी के भाव

देखते-देखते

नदी नदी के उजले माथे पर
मैला उतरने लगा


सिकुड़ने लगे

उसके पाट

निर्जन हुए घाट

नदी के पेट में

भीतर-ही-भीतर
ढोल-सा लुड़कने लगा
तैज़ाबी मलवा

गाँव अब भी वही है

वही है नदी

अंतर बस इतना है—अब वह शोर नहीं मचाती

अब वह गीत नहीं गाती

बुद-बुद बहती है

चुप-चाप रहती है

किसनपुरा के पास एक नदी