भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

एक मित्र / श्रीनाथ सिंह

Kavita Kosh से
Dhirendra Asthana (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 15:06, 5 अप्रैल 2015 का अवतरण ('{{KKRachna |रचनाकार=श्रीनाथ सिंह |अनुवादक= |संग्रह= }} {{KKCatBaalKavita...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

दादा ने है बन्दर पाला,|
है वह बन्दर बड़ा निराला।|
दरवाजे पर बैठा रहता,
कुछ भी नहीं किसी से कहता।
शायद सोचा करता मन में-
पड़ा हुआ हूँ मैं बंधन में।
इससे भूल गया सब छल बल,
खा लेता जीने को केवल।
मैं उस राह सदा जाता हूँ,
नित चुमकार उसे आता हूँ।
जिससे वह खुश हो सोचे रे,
अब भी एक मित्र है मेरे।