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ओ मेरी संजीवनी ! / रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

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भोर किरन
अंक में जगी
अधमुँदे नयन
खिली कौमुदी
सिंचित हुआ मन
अधर रस
स्मित बन छलका
अंकशायिनी !
बिखरी थी अलकें
झुकी पलकें
रूप सिन्धु छलके
युग जी लिया
अधर मधु पिया
पी लिये सभी
अश्रु जग ने दिये
मिले दो पल
अधरों से अधर
युगों की प्यास
और हुई मुखर
नैनों से बहे
मदभरे निर्झर
स्वर्ग जी लिया
करके आचमन
लौटे हैं प्राण
ओ मेरी संजीवनी !
प्राण -वह्नि मोहिनी!

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