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और मैं सिगरेट पीता हूँ / शरद बिलौरे

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यह कविता किसी और दिन लिखी गई थी, लेकिन आज अचानक बहुत महत्त्वपूर्ण हो गई है। 18 महीनों के लम्बे इलाज के बाद आज मेडिकल फिटनेस की रिपोर्ट आ गई है। मुझे पूर्णरूपेण स्वस्थ करार दे दिया गया है। अतः अब तो टी० बी० की बीमारी का अहसास भी कभी (कालेज के प्रारम्भिक दिनों में) पूर्ण भावुकता से किए गए (असफल) प्यार के अहसास जैसा लगने लगता है, जो कभी-कभी किन्ही निजी क्षणों में भीतर, बहुत भीतर कहीं सालता है और फिर से बीमार होने का मन करता है और मैं सिगरेट पीता हूँ... (डायरी)


वह टी० बी० का मरीज़
रात साढ़े ग्यारह बजे
टी० बी० हास्पिटल के सामने से
सिगरेट पीता गुज़रता है
अस्पताल के इतने बड़े बरामदे में
अकेले जल रहे
चालीस वाट के बल्ब को देख
मुस्कुराता है
खाँसते-खाँसते
रास्ते ही में थक जाता है
और घर पहुँच कर
एक गिलास पानी के साथ
एक गोली खा कर सो जाता है
सिगरेट
रात भर
उसके खोखले सीने में
लगातार जलती है
सुबह
वह फिर सिगरेट पीता है
खाँसता है
गोली खाता है
उसे यह सब
प्यार करने जैसा लगता है।