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"कमाल की औरतें २० / शैलजा पाठक" के अवतरणों में अंतर

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14:58, 21 दिसम्बर 2015 के समय का अवतरण

तुम यहां रुको
मैं रुक गई
जल्दी चलो
मैं दौड़ पड़ी

किसी से कुछ मत कहना
मैं चुप रही
अब रोने मत लगना
मैंने आंसू पी लिए

देर से आऊंगा
मैंने दरवाज़े पर रात काट दी
खाने में €क्या?
मैंने सारे स्वाद परोस दिए

तुम्हारे चिल्लाने से
सहम जाते हैं मेरे बच्चे

मैं तुम्हें नाराज़ होने का
कोई मौका नहीं देती
और तुम मुझे जीने का।