भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

"कर्मनाशा / संतोष मायामोहन" के अवतरणों में अंतर

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज
(नया पृष्ठ: <poem>मैं नाहना चाहती हूं कर्मनाशा नदी में, मैं धोना चाहती हूं अपने स…)
 
 
पंक्ति 1: पंक्ति 1:
<poem>मैं नाहना चाहती हूं
+
{{KKGlobal}}
 +
{{KKRachna
 +
|रचनाकार=संतोष मायामोहन
 +
|संग्रह=
 +
}}
 +
{{KKCatKavita‎}}
 +
<Poem>
 +
मैं नहाना चाहती हूँ
 
कर्मनाशा नदी में,
 
कर्मनाशा नदी में,
मैं धोना चाहती हूं
+
मैं धोना चाहती हूँ
 
अपने सभी -
 
अपने सभी -
 
पाप और पुण्य -
 
पाप और पुण्य -
मैं बनना चाहती हूं -
+
मैं बनना चाहती हूँ -
 
मनुष्य
 
मनुष्य
और देखना चाहती हूं -
+
और देखना चाहती हूँ -
 
अपने भीतर की
 
अपने भीतर की
 
मानवता ।
 
मानवता ।

01:46, 20 जुलाई 2010 के समय का अवतरण

मैं नहाना चाहती हूँ
कर्मनाशा नदी में,
मैं धोना चाहती हूँ
अपने सभी -
पाप और पुण्य -
मैं बनना चाहती हूँ -
मनुष्य
और देखना चाहती हूँ -
अपने भीतर की
मानवता ।

अनुवाद : नीरज दइया