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कविता-कन्या / मंजुला सक्सेना

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क़ैद है कविता हर एक दिल में, डगर में
भ्रूण कन्या-सी उपेक्षित हर नगर में ।

'वेदना'-सी माँ है जब विद्रोह करती
तड़पती, तपती, तब वह है प्रसवती
 
काग़ज़ों पर कोई कविता कन्या-सी
छूट जाती पर उपेक्षित अनसुनी सी
 
जब तलक प्रकाशक वर मिले न
दे उसे पहचान, जीवन, और मान ।