भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

"कांच के ख्वाब / गुलज़ार" के अवतरणों में अंतर

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज
(नया पृष्ठ: {{KKRachna |रचनाकार=गुलज़ार |संग्रह = पुखराज / गुलज़ार }} <poem> देखो आहिस्ता च…)
 
पंक्ति 4: पंक्ति 4:
 
}}  
 
}}  
 
<poem>
 
<poem>
देखो आहिस्ता चलो,और भी अहिस्ता ज़रा
+
देखो आहिस्ता चलो,और भी आहिस्ता ज़रा
 
देखना,सोच-समझकर ज़रा पावँ  रखना  
 
देखना,सोच-समझकर ज़रा पावँ  रखना  
 
जोर से बज न उठे पैरों की आवाज़ कहीं
 
जोर से बज न उठे पैरों की आवाज़ कहीं

16:04, 8 अगस्त 2010 का अवतरण

देखो आहिस्ता चलो,और भी आहिस्ता ज़रा
देखना,सोच-समझकर ज़रा पावँ रखना
जोर से बज न उठे पैरों की आवाज़ कहीं
कांच के ख्वाब हैं बिखरे हुए तन्हाई में
ख्वाब टूटे न कोई,जाग न जायें देखो

जाग जायेगा कोई ख्वाब तो मर जायेगा