भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

कोयल पंचम सुर में बोली / गुलाब खंडेलवाल

Kavita Kosh से
Vibhajhalani (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 03:18, 22 जुलाई 2011 का अवतरण

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज


कोयल पंचम सुर में बोली
मधुर सुरों ने ज्यों अंतर की दुखती गाँठ टटोली

शांत प्रकृति के उर में फिर से लहर प्यार की डोली
रंग-बिरंगे फूल आ गये बना-बनाकर टोली

जो रहस्य की बात आज तक नहीं गयी  थी खोली
फैल गयी है वह घर-घर में बनकर एक ठिठोली

तेरा वह छिपकर आना, मुख पर मल देना रोली 
जाने कैसे पल भर में ही थी अनहोनी हो ली 

नाच रही है स्मृति में कोई चितवन भोली-भोली 
फिर गुलाब की पंखड़ियों से भर ली मैंने झोली

कोयल पंचम सुर में बोली