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"क्रमश: तारक द्युतिहीन, लीन स्वर-मधुप-वृन्द / प्रथम खंड / गुलाब खंडेलवाल" के अवतरणों में अंतर

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गौरांग, स्वस्थ, तप-पूत, ज्योति के सायक-से
 
गौरांग, स्वस्थ, तप-पूत, ज्योति के सायक-से
 
पुरुषोत्तम सर्व-गुणोपम, विश्व-विधायक-से  
 
पुरुषोत्तम सर्व-गुणोपम, विश्व-विधायक-से  
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वन मध्य खड़े थे गौतम ऋतुपति-नायक-से
 
कंपित लतिका के भाव-सुमन सुख-दायक-से  
 
कंपित लतिका के भाव-सुमन सुख-दायक-से  
 
चरणों पर बिखर रहे थे
 
चरणों पर बिखर रहे थे

01:32, 14 जुलाई 2011 का अवतरण


क्रमश: तारक द्युतिहीन, लीन स्वर-मधुप-वृन्द
नयनों की स्वप्निल कुमुद-कौमुदी हुई बंद
उल्लसित अहल्या यौवन-सुषमा ले अमंद
आकुल, अधीर-सी भुला नींद के द्विधा-द्वन्द
छाया-सी भू पर उतरी

वक्सर के पावन सिद्धाश्रम तक आ सहास
सहसा ठिठकी स्वर-मुग्ध मृगी-सी बद्धपाश
मुड़ चली सघन तरु-तले, सलज, सभ्रम, सलास
मधुमास छा गया वन-वन, पिक-रव-प्रियाभास
संकुचित भीत-सी सिहरी

  . . .

गौरांग, स्वस्थ, तप-पूत, ज्योति के सायक-से
पुरुषोत्तम सर्व-गुणोपम, विश्व-विधायक-से
वन मध्य खड़े थे गौतम ऋतुपति-नायक-से
कंपित लतिका के भाव-सुमन सुख-दायक-से
चरणों पर बिखर रहे थे
  
उज्जवल ललाट, घनश्याम लहरते केश-जाल
गैरिक पट, कटि-तट कसे, कंठ-धृत सुमन-माल
गंभीर, धीर, छवि-दीप्त, चेतना ऊर्ध्व-ज्वाल
प्रतिभा-प्रतिभासित, यशोदीप्त, कृश भी विशाल
क्षण-क्षण तप निखर रहे थे
. . .
सहसा नभ-ध्वनि सुन, 'सिद्धि तुम्हें दी स्रष्टा ने
मुनि! ग्रहण करो यह, व्यर्थ न मन शंका माने
बोले, 'स्वागत है, जीवन-सहचर अनजाने!
क्या तुम प्राणों के क्षत-विक्षत ताने-बाने
मृदु स्मितियों से बुन दोगी?
 . . .
'अंतर की अकलुष स्नेह-वृत्ति कब हुई मृषा!
तन मिलता उससे जिससे मन की बुझी तृषा
सेवा-वंचित यह, आर्य! आपकी खिन्न दशा
मैं दूँगी इन सूखे अंगों में सुरभि बसा
जो असमय कुम्हलाये हैं
. . .
दिन भर तप कर रवि-से लौटोगे, जभी गेह
मैं संध्या-सी देहरी-दीप में भरे स्नेह
अर्पित कर दूँगी यह नामांकित सुमन-देह
मैं बरस, बिखर, जैसे पावस का प्रथम मेंह
अंतर मधु से भर दूँगी'
. . .
यों ही जीवन के बीते कितने संवत्सर
चढ़ ज्वार प्रेम का चोटी तक, फिर गया उतर
हिम-ताप-विकल पावस कितने दृग से झर-झर
पथ के प्रवाह को मृदुल कठिनताओं से भर
आ-आकर चले गये भी
. . .
संध्या-वंदन को गये त्वरित मुनि छोड़ शयन
पनघट पर अटपट पहुँच अहल्या चकित नयन
घट पर से बहते जल में असफल मीन-चयन
बन गयी सहज जय-ध्वजा मयन की ज्योति-अयन
मुक्तालक-जित घनमाला
 
खोयी-खोयी-सी चिर निरर्थ-मन, यहाँ-वहाँ
लौटी कुटीर में शेष त्रियामा निशा जहाँ
'छल आज उषा का! मुनि कैसे चल दिए? कहाँ?'
मलयज ने कानों से लगकर कुछ मौन कहा
थर-थर काँपी वह बाला
. . .
यह कौन कक्ष में पूनो शशि-सा मंदस्मित
धकधक करता था हृदय, चेतना तमसावृत
'ऋषि लौटे निशि-भ्रम जान कि प्रिय प्राणों में स्थित?
कटंकित, अपरिचित नि:श्वासों से आकर्षित
सर्वांग शिथिल, भय-कातर
 
अवसन्न गौतमी, झलका ज्यों दव-सा समक्ष
'यह इंद्रजाल रच रहा कौन गन्धर्व, यक्ष?
फूले फेनिल जलनिधि-सा उठ-उठ मुकुर-वक्ष
द्रुत गिरा, मृगी-सी चौंक, चकित सहसा अलक्ष
सकुची सुन प्रेमभरे स्वर
. . .
सुरपति यह जिसने पति-अनुकृति धर ली अनूप
पाटल-विकीर्ण पथ नहीं, अतल चिर-अंध-कूप'
कानों से लग बोले दृग-मधुकर, दंश-रूप
आया कुसुमित शर ले अरूप वह बाल-भूप
बह चली वायु अनुकूला
 
सुगठित भुज-पट्ट, कपाट-वक्ष, हिम-गौर स्कंध
तनु तरुण भानु-सा अरुण, स्रस्त-तूणीर-बंध
दृढ जटा-मुकुट-शिर, कटि-तट मुनि-पट धरे, अंध
प्रेमी के छल पर सलज, विहँस, उन्मद, सगंध
उर-सुमन प्रिया का फूला
. . .
पगध्वनि सहसा, भुजबंधन-से खुल गये द्वार
पूजोपरान्त मुनि लौटे करते-से विचार
'विभ्रम कैसा? मन आज विकल क्यों बार-बार?
तप-स्खलन-हेतु क्या यह भी कोई नव प्रहार?
कुछ नहीं समझ में आता
 
देखा सहसा सम्मुख जो चिर-कल्पनातीत
सुरपति कुटीर से कढ़े प्रात-विधु-से सभीत
थी खड़ी अहल्या विनत, लिए मुख-कांति पीत
स्मितमय भौंहों में अतनु छिपा था दुर्विनीत
दुहरी जय पर इतराता
. . .
प्रेयसी वही जो वय-स्नेहाकुल, सजल-प्राण
मानस के तट तिर आयी उस दिन चिर-अजान
रागिनी वही यह आज विवादी-स्वर-प्रधान
पौरुष की हँसी उडाती-सी विपरीत-तान
स्वर के पर खोल रही थी
 
अपराधी-सा पत्नीत्व खडा नत-नयन मौन
यौवन अल्हड-सा कहता, 'इसमें पाप कौन!'
हँसती सुन्दरता, 'अपना-अपना दृष्टिकोण'
चेतना भीत भी पिये प्रीति की सुरा-शोण
दीपक-सी डोल रही थी
 
पल में विद्युत्-सा कौंध गया निशि का प्रसंग
वह छद्म प्रात का ढंग, अचानक स्वप्न-भंग
नख-शिखु तनु में व्यापी जैसे ज्वाला-तरंग
रक्ताभ नयन, आनन पर क्षण-क्षण चढ़ा रंग
अपमान, घृणा, पीड़ा का
 
'मैं क्षीणकाय, नि:संबल, निर्बल, संन्यासी
तुम बज्रायुध , स्वर्गाधिप, नंदन के वासी
इस पर भी बुझी न तृषा तुम्हारी सुरसा-सी
कर गए मलिन चोरी से घर आ, मधुहासी--
यह सुमन स्नेह-क्रीडा का
. . .
धिक् सुरपति! जिस पर लुब्ध बने सुर-सदन-त्याग
तुम आये इस निर्जन में वही सहस्र-भाग
अंगों में होगी व्याप्त तुम्हारे ज्यों दवाग
यह अयश-कालिमा ले सिर पर, चिर-मलिन काग
तुम भटकोगे त्रिभुवन में!
  
मुड़कर देखा सहसा पत्नी मुख-छवि विवर्ण
नयनों की झर-झर व्यथा, मर्म-लज्जा अवर्ण्य
पतझर की एकाकिनी लता ज्यों शेषपर्ण--
जीवन-भिक्षा को, भय-कंपित आपाद-कर्ण
धूसर अंचल फैलाए
 
तड़पा अंतर करुणा-ममता-आक्रोश-विकल
मुनि रहे आत्म-कातरता में जलते, निष्फल
फैला कपोल पर दोषी पलकों का काजल
नारी की दुर्बलता का साक्षी-सा प्रतिपल
कहता था अमित कथाएँ
 
जीवन विषमय कर गयी हृदय की क्षणिक चूक
मन काँप उठा सुख का सपना पा टूक-टूक
पल में कैसा यह मन्त्र काम ने दिया फूँक
लज्जा-भय-च्युत नारीत्व लुटा जैसे मधूक
वंचक मधुपायी-कर से
 
कुंचित भौंहों पर झलकी चल ज्वाला-तरंग
'स्वामी! अपराध क्षमा,' कहती-सी दृष्टि-संग
चरणों पर पति के गिरी अहल्या शिथिल-अंग
मुनिचीख उठ--'पाषाणी! यह क्या क्रूर व्यंग्य
विष पी डर रही लहर से?
. . .
सूना कुटीर, आश्रम में उड़ता पवन पीत
पतझर-झंझागम-विटप काँपने लगे सभीत
पल में सूखी जैसे जीवन-धारा पुनीत
रह गयी गौतमी शिला-सदृश सुखदुखातीत
निज भाग्य अंक ले फूटे