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गढ़ू सुम्याल (सुमरियाल) / भाग 2 / गढ़वाली लोक-गाथा

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   ♦   रचनाकार: अज्ञात

ले मेरी जिया<ref>मां</ref>, मैं राणी आज लायूँ,
आरुणी जंगल, जड़ी खाली बूटी,
घास काटीक लाली, भैंसी मेरी चराली,
तेरी सेवा करली माता, ब्वारी<ref>बहू</ref> तेरी सुरमा!
तबरी<ref>तब</ref> बिटैने<ref>से</ref> तौंकी, होणी-खाणी ह्वैगे-
गढ़ू सुमन्याल, चैन की मुरली बजौन्द!
अन्न का भण्डार ह्वैन, ऊँका धन का कोठारा,
तौंक तई तै, आरुणी जंगल मा ही, सोनों बरखे!
तब सूणीयाले दीपू बडान<ref>ताऊ</ref>, तौंकी होणी खाणी,
ऐ दिन वैन, हात धरे लाठी,
रोन्दो-बरांदो तब, आइ गए आरुणी जंगल।
जदेऊ<ref>जयदेव, नमस्कार</ref> पाँछो मेरा, बड़ा जी जेटा पाठा।
आशीष मेरा बेटा, गढू माल!
नी रये क्वी-कत, बेटा हमारा वंश मा।
बार बरस को मामलो<ref>मालगुजारी</ref>, ऐला तैला सलाण रैगे।
तेरा बाबून तरवार मारे, तू तरवार मारलो,
तू होलू बेटा छेतरी बंगल, हमारू अंगस<ref>अंग</ref>!
तिन जाणा बेटा, तैला<ref>तल्ला-मल्ला</ref> मैला सलाण,
मामलो उगै<ref>वसूल</ref> लौण।
तब जिया लीलादेई, इना बैन बोदी:
जि जााू बेटा, तै सलाण बैरियों का,
नि जाण गढू, काल का डिस्याण<ref>बिस्तरा</ref>।
तौं सलाण्योंन<ref>सलाण के रहने वालों ने</ref>, तेरो बाबू मारे,
तू होलू गढ़ मेरो, एकलो एकून्त!
हे जिया, सचू होलू मैं, ई बाबू को बेटा,
सलाण साथीक लौलू, बैरी बाँधीक!

पैरीने<ref>पहन लो</ref> वैन<ref>उसने</ref> अपणी, ऐड़ी हत्यारी<ref>लड़ाई के कपड़े और हथियार</ref>-
सुरमा रौतेली, पथेणा<ref>आँसू</ref> नेतर छोड़ दे:
कना जाला स्वामी, विराणा विदेश,
आरुणी वण मा हम, आनन्द रौला।
आज जाणू छौं सुरमा, भोल औलू बौड़ी<ref>लौट कर</ref>,
कायरो<ref>कातर</ref> नी करणो, तिन ज्यू अपणो!
जाणक जावा स्वामी, एक बात मेरी ली जावा,
एकुला न चल्या बाट, विराणी<ref>दूसरे की</ref> न बैठ्याँ खाट।
प्रफूल ह्वैक दीपू, गैगे अपणा दीपू कोट।
गढू बैठे अपणी, भँवरपंख घोड़ी,
सलाण मा तब, खबर या पौंछीगे-
जेको बाबू हम लोग न मारे,
वैको बेटा यख पौंछीगे!
तब खोदीयाले तौन, सौ जरीब खाड<ref>गड्ढा</ref>
बख मा पलंग बिछैगे, पलंग मा चदर।
सलाण का लोक तब, कठा<ref>इकट्ठा</ref> होई गैन,
औ ज्वान ज्वान छोरी, स्यूँद<ref>माँग</ref> गाडदी<ref>निकालती</ref>
अब आयो हमारो पदान<ref>प्रधान</ref>!
तौं लोगून बड़ो, सतभौ दिखाए,
लाई ऐन तब बै, पलंग मा बैठौणा।
याद आये तब गढू, सुरमा की बोलीं-
पलंग मारी वेन, बेत की चोट,
चदर उन्दू लैगे, खाड देखेण गैरी।
भली मैमानी<ref>मेहमानदारी</ref> करी, तुमन मेरी भायों,
तुमारो ऐसा न, कबी न भूलूँ।
कनो होये माल<ref>योद्धा</ref>, घोड़ी असवार

छौलो-बुक<ref>धौन्ना</ref> छौलो, ह्वैगे घोड़ी-
कला-सी कच्यैन<ref>काटा</ref> वैन, गाबा<ref>कन्दमूल</ref> सी काटीन!
साधीयाले तैन, स्यो सलाण,
मामलो उगाई याले!
गज करो<ref>करों के नाम</ref>, मुण्ड करो, स्यूँदी सुप्पो लगैले।
खिमासारी तब, पैटीगे<ref>प्रस्थान किया</ref> माल,
घर मू दीप न मदों, मन्सूबा ठाण्याल्या,
गढू़ न मरी जाण, सुरमा मैन अपणा नौनाक<ref>लड़को को</ref> ल्यौण।
तब वो सुरमा का मामों, एक खाल रुप्या देन्द,
सुरमा रौतेली, बुलैले मामाकोट।
दीपीकोट बिटी<ref>से</ref> ह्वैन बरात की त्यारी
सुरमा की माम्योंन, देखे सुरमा रूपवन्ती,
तीन जाणी नी, ना पछाणी, सोचे-
या हैकी सौत आई, कखन काल हमारी।
अनजाणा मा तौन, बीं विष खेलैले,
सुरमा अंगुडी<ref>आगे</ref> छई, पघुण्डी ढलीगे।
दीपून धरयाले तब, वा डोला पर,
पर विधाता की लेख, इनी होंदी-
रस्ता मा गढू़ माल, खाणा छौ पकौणू।
सुरमा रौतेली की, तब आँखी खुलीन,
रोन्दी छ तुड़ादी तब, वा चाखुड़ी<ref>चकोरी</ref> सी बराँदी।
मैं छऊँ सुरमा राणी, गढ़ू माल की,
कु छ मैं सणी, डोला पर लिआणू।
डोला से नजर लगे, माल का रस्वाड़ा<ref>रसोई</ref>,
भादों जसो बेला<ref>भैंसा</ref> छयो, मगन पड्यूँ,
डेड हात पीठ छई, डेड हात छाती।
होलू त सी होलू मेरो, स्वामी प्यारो।
फेंकदी तब गारा, सुरमा रस्वाड़ा मा,
टपराँदो<ref>इधर-उधर देखना</ref> तब गढ़ू सुमन्याल-
अला<ref>अरे</ref> कैको आये यो काल,
कैन मेरा रस्वाड़ो पथराये।
डोला से देखे वैन, हात अगाड़ी बढ़द,
उंडो देखे वैन फुंडो, रौड़दो छ दौड़दो।
गढू़ माल, डोला मु जाँदो,
सुरमा रौतेली माथो नवौंदी-
मैं छऊँ स्वामी, विपता की मारी,
किस्मत की हारी, छऊँ तुमारी नारी।
दुश्मनुन जैर खलै, मैं बेहोश होयूँ,
तुमारा बड़ा<ref>ताऊ</ref> जीने<ref>जी ने</ref>, या कुदरत कराये।
गढ़ू माल चढ़े, छेतरी को रोष,
तैकी छाती का, बाल बवरैन!
ओंठ बबलैन वैका, भुजा फफड़ैन
आँख्यों मा वैका लोइ सरे,
दीपू बडान, यो क्या त करे?
मारीन तब बैन, दीपू का साती लड़ीक,
दी बड़ा भी दगड़े, स्वर्ग पौंछाए!
तब दीपीकोट मा वैन
कोटू बोणो कर याले!
बैरी को एक नी रखे,
रीझाना को-सी शेष।
तब सुरमा लोक, गूढ़ू सुन्याल,
खिमासारी ऐगे,
माता न बोलो भेंटें,
ब्वारीन सासू का पैर छुयाँ,
खिमासारी कोट मा, बजे आनन्द बढ़
मर्द मरी गैन, बोल रई गैन,
मर्दू का पँवाढ़ा, गाया गैन!

शब्दार्थ
<references/>