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चीड़ों पर बारिश / कर्णसिंह चौहान

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चीड़ वनों पर बारिश हो रही है
घुंघराले बालों से बूँद-बूँद
टपक रहा पानी
छरहरे तनों पर बारिश हो रही है
तन के पहाड़ों वादियों से
चू रहा मेह।

तराशी बाहें परस्पर लिपटी
एक दूसरे की छाती में
छिपे बदन
रिमझिम हँसी पूरे जंगल में छिटक गई है ।

उमंगे नाच रहीं
पास के तरवर में ।
रास्ता बनाती यह सड़क
फिसल कर उठेगी
घने बियाबन में छिप जाएगी
वहाँ घोंसलों में कँपते सिकुड़े
शावक
अपलक विहार रहे हैं
ख़ूबसूरत देवदारु का छालहीन तना
कितना भूरा निकल आया हैं
चीड़ वनों पर बारिश हो रही है ।

फूत्कार से गुंजायमान
यह नीरव प्रदेश
सौरभ से महक रहा है
कटीली भवों सा खिंच आया इंद्रधनु
उधर ऊपर
शायद कोई गिरजा है
शायद कोई गुफ़ा

वहाँ कुछ हो रहा है
लाल सूरज
बादलों की ओट में झूल गया है
और जंगल धू-धू कर जल उठा
आओ इन फूलों को चुनकर
नीचे उतर चलें ।