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चील जब घोंसला बनाती है / रमेश रंजक

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चील जब घोंसला बनाती है
पहले वह मौसम का जायजा लेती है—
आसमान साफ़ होते ही
हरे पत्तों के पीले होने का,
पीले पत्तों के झरने का
इंतज़ार करती है...
...और फिर
नंगी टहनियों की गोद में
तीलियों को बिछा कर
(अपने वज़न को तोलती हुई)
ऐसी तेज़ आवाज़ में बोलती है
कि आस-पास के
निरीह पखेरू-जगत में
दहशत-सी फैल जाती है ।

चील जब घोंसला बनाती है
उसकी आँखें
राडार की तरह घूमने लगती हैं;
कोई मामूली चिड़िया नहीं है वह
जो अपने अंडे-बच्चों की रक्षा के लिए
हरियाली का मुँह जोहती रही,
चील है वह
निर्दय, क्रूर, खूँखार
जिसकी शिकारी आँखों में
ख़ून तैरता है
किस की ताब है
जो उसके घोंसले पर आँख उठाए ?
उठी हुई आँख को
ज़िन्दा छोड़ देना
उसके स्वभाव में नहीं है ।

चील जब घोंसला बनाती है
एक चिड़चिड़ापन
उसकी चोंच को
पंजों को,
डैनों को,
बहुत आक्रामक बना जाता है,
उस वक़्त
मख़ौल नहीं होता—
पतंगे का हवा में आज़ाद उड़ना,
चहे का छुट्टल दौड़ना,
कलेऊ का खेत पर पहुँचना,
ऐसा होते ही
हवा में गोता लगाती हुई
कलेऊ को डैनों से गिराकर,
पतंगे की चोंच में,
चूहे को बलिष्ठ पंजों में दबाकर
आसमान में उड़ जाती है ।

चील है वह
कोई मामूली चिड़िया नहीं है
उसे दूसरों का खुलापन
बेहद नापसन्द है
दही की तरह
जमाई हुई उसकी चुप्पी
जब किसी खोमचे वाले की आवाज़ से
टूटती हुई-सी महसूस होती है
उसके डैनों में
एक ज़ालिमाना हरकत होती है...
एक तुले हुए झपाटे में
मेहनत और पेट पर
लात मार कर
अपनी पूरी ताक़त के साथ
पैनी आवाज़ में चिल्लाती है
चील जब घोंसला बनाती है।