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जब तक शब्द के दीप जलेंगे सब आएँगे तब तक यार / अब्दुल अहद 'साज़'

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जब तक शब्द के दीप जलेंगे सब आएँगे तब तक यार
कौन उतरेगा दिल के अंधे भाओं के मतलब तक यार

चन्द बरस की राह में कितने साथी जीवन छोड़ गए
जाने कितने घाव लगेंगे उम्र कटेगी जब तक यार

पूछ न क्या थी पिछले पहर की दर्द भरी अनजानी चीख़
जो मन के पाताल से उट्ठी रह गई आ के लब तक यार

कब बाजेगा गाँव के मरघट के परे मन्दिर के सँख
कब काला जादू टूटेगा रात ढलेगी कब तक यार

'साज़' ये शेरों की सरगोशी तिरी मिरी अन्दर की बात
रुस्वा हो कर रह जाएगी पहुँच गई गर सब तक यार