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जीवन छलना है / रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

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सिर पटका
जडीभूत थी शिला
न वह टूटी
न ही कभी पिंघली
मस्तक फूटा
प्रयास खेत रहे
अभिमन्यु -से
जीवन छलना है
अँधेरे रास्ते
अन्धों के संग -संग
होकर मौन
पीछे ही चलना है
हिम- सा गलना है।