भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

तेरी मेरी ये कहानी ख़ूब ख़ूबाँ / सुजीत कुमार 'पप्पू'

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

तेरी मेरी ये कहानी ख़ूब ख़ूबाँ,
गुनगुनाती ज़िंदगानी ख़ूब ख़ूबाँ।

हंस लो गा लो ज़रा-सा मुस्कुरा लो,
सामने रुत है सुहानी ख़ूब ख़ूबाँ।

कौन जाने कब यहाँ क्या होगा आगे,
ये कहानी है पुरानी ख़ूब ख़ूबाँ।

रोज़ होता है मिलन ये कम नहीं है,
छूट जाती है निशानी ख़ूब ख़ूबाँ।

जान के ही दर्दे दिल सौदा किया है,
तू लगे परियों-सी रानी ख़ूब ख़ूबाँ।

देखते ही कुछ मुझे होने लगा है,
मैं कहूँ क्या बेज़ुबानी ख़ूब ख़ूबाँ।

सच कहूँ मैं दिल ये तेरा हो गया है,
प्यार की है ये रवानी ख़ूब ख़ूबाँ।